Monday, 8 June 2015

A story of starvation death published in 1997


भूख से मौत

नेता, अफसरों को प्रेषित जानकारी भी निरर्थक
purushottam singh thakur
महुलकोट ( खरियार ) । बीडीओ, तहसीलदार, डिप्टी कलेक्टर , कलेक्टर , विधायक दुर्योधन माझी से लेकर सांसद भक्त चरणदास तक आठ-आठ अधिकारियों एवं जनप्रतिनिधिओं को रजिस्टर्ड पत्र दिया, पर किसी साहब या नेताओं ने इस पर ध्यान देने की जरूरत महसूस नहीं की। इतने बड़े बड़े लोग हैं, कम से कम हमारे पत्र पाने की सूचना देने की शिष्टाचार निभाते। हम गरीब हैं इसलिए हमारे दु:ख दर्द सुनने वाला कोई माई बाप नहीं है। इन सारे शिकायतों की बौछार महुलकोट के जसोवंत शबर ने इस प्रतिनिधि के सामने किया।
उसके इस गुस्से का कारण है, पिछले माह उनके गाँव का एक गरीब मजदूर डमबूढ़ा माझी ( 43 ) वर्ष की उम्र में भूख से मौत। जिस से दु:खी इस ग्रामीण ने इसकी सूचना इन अधिकारियों और नेताओं को दी । पत्र रजिस्टर्ड करने के लिए गाँव की यज्ञ कमेटी के पैसे खर्च किए गये थे।
गाँव के ही कुँवर शबर व नेत्र भोई ने कहा कि यहाँ ग्रामीण ज्यादातर चंअरा जंगल से जलाऊ लकड़ी लाकर खरियार ले जाकर बेचते हैं। यहाँ से खरियार 13 किमी है और उतनी ही दूर इधर चंअरा जंगल है। ड़मबूढ़ा माझी भी महुलकोट के उन सैंकड़ों लकड़ी बेचकर पेट पालने वालों में से एक था। इस दफा सूखे के कारण गाँव में खेतिहर मजदूरी तो नहीं मिली साथ ही लकड़ी बेचकर पेट पालना भी परिश्रम का काम है और मुश्किल भी। इधर पैसे कि समस्या से डमबूढ़ा माझी के घर कभी चूल्हा जलता तो कभी नहीं। खाने पीने के अभाव के चलते वह कमजोर भी होगया । इस तरह गत माह उसकी अत्यंत ही दयनीय स्थिति में भूख से मौत हो गई । इस से व्यथित ग्रामीण ने इस विषय की जानकारी बीडीओ से लेकर कलेक्टर तक, एम एल ए और एम पी तक को दी। पर किसी ने नहीं सूनी । डमबूढ़ा के परिवार में उसकी पत्नी 39 वर्षीया गोमती के अलावा 14 वर्षीय लड़का भगवान माझी है।

यहाँ पर उल्लेखनीय है कि गोमती ग्रीन कार्ड धारी हैं। उनके दो लड़के के होने के बाद 1985 में परिवार नियोजन करवाया था। जिसमें से बाद में एक लड़का दवाई पानी के अभाव में पहले ही मर चुका है। जब डमबूढ़ा जीवित था तभी इन लोगों ने ग्रीन कार्ड के अंतर्गत सरकार द्वारा दी जा रही सहायता के तहत 22.8.88 में उसे ज़मीन आदि दिलवाने के लिए 40 रुपये देकर एक दरख्वास्थ लिखवाकर तत्कालीन अविभाज्य कालाहांडी के जिलाधीश को दी थी। परंतु तब भी वहाँ से कोई जवाब नहीं आया। गोमती कहती हैं, “ तहसीलदार कार्यालय शायद मेरे पिताजी भी नहीं देखे हों, पर इसके लिए मैंने देखा। वहाँ से आर आई ( रेविन्यू इंस्पेक्टर ) आने वाला था, जिसके चलते मैंने घर में चाय और चीनी का इंतज़ाम किया था पर उसके न आने से सब नुकसान हो गया।
भगवान माझी उसके पिता कि मृत्यु के बाद से पिछले महीने से आश्रम स्कूल से वापस आगया है। सक तो यह है कि वह इस से पूर्व  बिरीघाट आश्रम स्कूल में पढ़ता था। बाद में वह बोडेन आश्रम स्कूल में दाखिला लिया। बोडेन स्कूल में 200 रुपये किसी फीस बाबाद हैड मास्टर द्वारा मांगने पर जब भगवान नहीं दे पाया तब उसे स्कूल से बाहर आजाना पड़ा। जब हमने पूछा कि अब स्कूल जाएगा क्या ? वह जवाब देने से पहले उसकी माँ कहती है “ वह स्कूल चला जाएगा तो मुझे अब कौन पालेगा ? “ अब भगवान ही गोमती का एक मात्र सहारा है। भगवान जंगल जाकर लकड़ी लाता है तब गोमती लकड़ी को लेकर खरियार बेचने जाती है। पर उसकी स्थिति अब अत्यंत दयनीय है। गाँव वालों ने गाँव में दी जारही आपात भोजन व्यवस्था के अंतर्गत इनके नाम देना चाहा पर उसमें भी इनका नाम नहीं चढ़ाया गया। इस बात से ग्रामीण सभी दुखी हैं।
परिवार नियोजन का सुखी परिवार का सपना देखने वाला यह परिवार अब चरमराता नज़र आरहा है। इनकी ओर शीघ्र ध्यान देने के साथ साथ गाँव में लोगों को काम मुहैया भी शीघ्र कराने कि आवश्यकता है। डमबूढ़ा के मौत की समाचार इन लोगों के चुप रह जाने के के बारे में गाँव के पूर्व समिति सदस्य नरहरी का कहना है की इस प्रकार के सूखे के समय जब हमारे गाँव से कई मर गए थे, तब भी कुछ नहीं हुआ, जो आदमी मर गया तो मर गया, फिर ये अधिकारियों आदि शिकायत कभी नहीं की।

पर इस पकार की एक गंभीर समस्या की सूचना पाने के बावजूद अधिकारियों ने इस ओर ध्यान नहीं दिया पर इस घटना से गाँव के लोगों में प्रशासन के खिलाफ रोष फैलगई है। इस लिए इस परिवार को शीघ्र काम देने के साथ साथ और आगे भूख से मौत से रोका जाये।  ( 1997 में पुरुषोत्तम सिंह ठाकुर की रिपोर्ट, दैनिक भास्कर )

No comments:

Post a Comment